ऐ हमसफ़र
November 30, 2023तू है, एक तू ही है, जिस तरफ़ भी जाए नज़र।
तू ही रात और दिन, तू ही तो है शाम-ओ-सहर।।जाते जाते
एक पल में सारी ख़ुशियाँ साथ वो लेकर गए।
जाते जाते ज़िन्दगी भर के वो ग़म देकर गए।।आदमी
बे-सबब इन्सानियत यूँ जलाता है आदमी।
ख़ुद ही अपना ख़ुदा, बना जाता है आदमी।।रहने दो
मुख़्तसर वो बात दिल की, दिल में रहने दो।
रुस्वा ना हो जाए कहीं मोहब्बत... रहने दो।।आँखों का क़ुसूर
जाने कैसी ये मदहोशी, कैसा है ये सुरूर!
ना है ख़ता-ए-जाम ये, है तेरी आँखों का क़ुसूर।।महफ़िल में
महफ़िल में उनके आने की, जब भी ख़बर होती है।
सोए कुछ अरमानों के भी, रगों में लहर होती है।।देखा है
ग़मों को हमने यूँ, महकते हुए देखा है।
फूलों को खुशियों से, दहकते हुए देखा है।।आज भी बरसात है
हल्की हल्की सी बूँदें यूँ, तपती ज़मीं पर जब गिरती।
सौंधी सौंधी सी खुशबू, जब सारे जहाँ में बिखरती।
तब ऐसे ही खूबसूरती, कुछ तुम्हारी भी निखरती।ये कहाँ आ गए हम!!!
बनाए थे हमने जब, ये धर्म ये मज़हब।
सोचा था हर दिल में, बसने लगेगा रब।
क्यूँ राह भटके, फिर कैसे, कहाँ, कब?
देखते देखते, यूँ चलते चलते,
ये कहाँ आ गए हम!!कभी दुश्मन को
कभी दुश्मन को दोस्ती की नज़र से तो देखो।
कभी नफ़रत की गहराई से उभर के तो देखो।।थोड़ी देर और
अभी महफ़िल में तुम हो और है हम, थोड़ी देर और।
ठहर जाओ, अभी रंगीं है आलम, थोड़ी देर और।।













